सहानुभूति जरूरी है, लेकिन जन सुरक्षा सर्वोपरि : आवारा कुत्तों पर केरल हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी: "यह अब जंगली जानवरों जैसा हमला बन चुका है"
Ashwani Kumar Sinha
Thu, Jul 31, 2025
📰 विशेष रिपोर्ट | आवारा कुत्तों पर केरल हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी: "यह अब जंगली जानवरों जैसा हमला बन चुका है"
📅 दिनांक: 30 जुलाई 2025 | 📍स्थान: केरल / भोपाल
केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में राज्य में आवारा कुत्तों द्वारा हो रहे हमलों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। न्यायालय ने स्पष्ट टिप्पणी की कि "अब ये हमले जंगली जानवरों के हमलों की तरह गंभीर और खतरनाक हो गए हैं।" कोर्ट ने कहा कि यदि सरकार और स्थानीय निकाय समय पर ठोस कदम नहीं उठाते, तो यह स्थिति एक मानव जीवन संकट में बदल सकती है।
⚠️ पृष्ठभूमि:
हाल ही में केरल के विभिन्न जिलों से लगातार खबरें सामने आई हैं जहां बच्चों, बुजुर्गों और आम नागरिकों पर आवारा कुत्तों द्वारा जानलेवा हमले हुए हैं। कई मामलों में लोगों को गंभीर रूप से घायल होना पड़ा है, और कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं में मौत भी हुई है।
📌 कोर्ट की सख्त टिप्पणी:
कोर्ट ने कहा कि "आवारा कुत्ते अब सिर्फ सामाजिक समस्या नहीं रहे, ये सार्वजनिक सुरक्षा का गंभीर खतरा बन चुके हैं।"
सरकार और नगर निकायों को निर्देशित किया गया है कि वे फौरन प्रभावी योजना बनाएं – जिसमें नसबंदी, आश्रय, टीकाकरण और जरूरत पड़ने पर खतरनाक कुत्तों को अलग करना शामिल हो।
🏙️ कॉलोनी स्तर पर उत्पन्न सामाजिक टकराव:
भोपाल और देश के अन्य शहरी क्षेत्रों में भी यह समस्या तेजी से उभर रही है। कॉलोनियों में कुछ कुत्ता प्रेमी नागरिक खुले में आवारा कुत्तों को भोजन कराते हैं, उन्हें नियमित रूप से आश्रय देते हैं। परंतु जब इन्हीं कुत्तों से रहवासियों को डर, हमला या स्वास्थ्य खतरा होता है और कोई विरोध करता है, तो कुछ लोग दबाव और धमकी देने लगते हैं। यह स्थिति "मानवीय सहानुभूति" बनाम "सामुदायिक सुरक्षा" की टकराहट बन चुकी है।
⚖️ क्या कहता है कानून?
IPC की धारा 268, 269, 290 के अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति ऐसे कार्य करता है जिससे जनसमुदाय को हानि या असुविधा हो, तो यह दंडनीय अपराध हो सकता है।
नगर निगम अधिनियम के तहत, खुले में जानवरों को भोजन कराना जिससे संक्रमण, गंदगी या खतरा हो – उस पर जुर्माना और कार्रवाई का प्रावधान है।
पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 में जानवरों के प्रति अत्याचार पर रोक है, लेकिन यह अधिनियम मानव सुरक्षा से ऊपर नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई फैसलों में यह कहा गया है कि "समाज के बाकी नागरिकों के मौलिक अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना किसी पशु या प्रेमी का।"
✅ समाधान की दिशा:
कॉलोनी में रेजिडेंट वेलफेयर सोसायटी (RWA) द्वारा नियम बनाना – कुत्तों को कहां, कब, कैसे भोजन दिया जाए।
नगर निगम द्वारा स्थायी "डॉग फीडिंग ज़ोन" निर्धारित करना।
आक्रामक या रोगग्रस्त कुत्तों की पहचान और पृथकीकरण।
पशु प्रेमियों और रहवासियों के बीच संवाद बैठकों के माध्यम से संतुलन।
🗣️ निष्कर्ष:
हाईकोर्ट की टिप्पणी समाज को चेतावनी है – सहानुभूति जरूरी है, लेकिन जन सुरक्षा सर्वोपरि। कुत्तों के संरक्षण के नाम पर यदि समाज के अन्य लोगों को खतरे, डर या असुविधा में डाला जा रहा है, तो प्रशासनिक कार्रवाई अब आवश्यक हो गई है।
समिति, रहवासी और प्रशासन – सभी को मिलकर संवेदनशील लेकिन संतुलित नीति अपनानी होगी ताकि मानव और पशु दोनों की गरिमा और सुरक्षा बनी रहे।
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