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यह दिन हमें "स्व" से ऊपर उठाकर "राष्ट्र और संस्कृति" के लिए जीना : संघ (RSS) द्वारा मनाई जाने वाली गुरुपूर्णिमा: एक प्रेरणादायी परंपरा

Ashwani Kumar Sinha

Thu, Jul 10, 2025

📰 संघ (RSS) द्वारा मनाई जाने वाली गुरुपूर्णिमा: एक प्रेरणादायी परंपरा की सत्यता पर आधारित विशेष रिपोर्ट

🔶 संघ और गुरुपूर्णिमा: ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में गुरुपूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि संगठनात्मक और वैचारिक साधना का महत्वपूर्ण अवसर है। यह दिवस भारतीय संस्कृति में "गुरु" के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का दिन है, परंतु संघ के परिप्रेक्ष्य में इसका विशेष रूप से गहरा भावार्थ है।

संघ में गुरु किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि "भगवा ध्वज" (संपूर्ण हिन्दू संस्कृति का प्रतीक) को माना जाता है। भगवा ध्वज में तप, त्याग, सेवा, और निष्ठा के गुण समाहित हैं। स्वयंसेवक इस दिन उस ध्वज के समक्ष अपने जीवन को राष्ट्र, समाज और संस्कृति के लिए समर्पित करने का संकल्प लेते हैं।

🔶 संघ परंपरा में गुरुपूर्णिमा का उद्देश्य

  1. चिंतन और आत्मविश्लेषण: स्वयंसेवक अपने आचरण, सेवा कार्यों और राष्ट्रकार्य के प्रति योगदान का आत्ममंथन करते हैं।

  2. संगठन की शक्ति का दर्शन: विभिन्न स्थानों पर शाखाओं में एकत्रित होकर स्वयंसेवक गुरु को समर्पण करते हैं, जिससे संगठन की एकात्मता का प्रदर्शन होता है।

  3. सांस्कृतिक स्मरण: यह पर्व स्वयंसेवकों को यह स्मरण कराता है कि संगठन और राष्ट्र की सेवा, किसी एक व्यक्ति की नहीं, अपितु सांस्कृतिक परंपरा की सेवा है।

🔶 RSS की गुरुपूर्णिमा पर होने वाली गतिविधियाँ

  • विशेष बौद्धिक सत्र का आयोजन होता है जिसमें विचारक, प्रचारक या वरिष्ठ स्वयंसेवक गुरुपूर्णिमा के महत्व पर प्रकाश डालते हैं।

  • 'गुरु दक्षिणा' के रूप में स्वयंसेवक स्वेच्छा से दान देते हैं। यह गुरु के प्रति कृतज्ञता और संगठन हेतु समर्पण का प्रतीक होता है।

  • संघ ध्वज के समक्ष सामूहिक प्रणाम, यह गुरु (ध्वज) को केंद्र मानकर सेवा का व्रत होता है

  • शाखा में सांस्कृतिक प्रस्तुति, गीत, कविताएँ व संघ-गीत का गायन होता है, जो प्रेरणा का माध्यम बनता है।

🔶 ऐतिहासिक सत्यता और प्रमाण

  • डॉ. हेडगेवार जी ने 1928 से ही गुरुपूर्णिमा को संघ परंपरा में सम्मिलित किया।

  • उन्होंने स्पष्ट रूप से "किसी व्यक्ति विशेष को नहीं, भगवा ध्वज को ही गुरु मानने" की परंपरा को स्थायी किया।

  • यह परंपरा आज भी RSS की प्रत्येक शाखा में निभाई जाती है।

🔶 स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणा

  • गुरुपूर्णिमा पर हर स्वयंसेवक अपने जीवन की दिशा तय करने और संगठन में अपने उत्तरदायित्व को पुनः स्मरण करता है।

  • यह दिन उसे "स्व" से ऊपर उठाकर "राष्ट्र और संस्कृति" के लिए जीने का प्रण दिलाता है।

🔶 समापन संदेश
संघ की गुरुपूर्णिमा, गुरु के व्यक्तिपूजक नहीं, विचारपूजक स्वरूप का अद्वितीय उदाहरण है। यह न केवल संगठन के अनुशासन और समर्पण का उत्सव है, बल्कि प्रत्येक स्वयंसेवक के जीवन में आत्मबोध और राष्ट्रसेवा का नवसंकल्प भरने वाला दिन है।

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